भारतीय सेना का विदेशी धरती पर किया गया सबसे खतरनाक मिशन.

   .                                    सर्जिकल स्ट्राइक के बारे में तो सभी जानते हैं भारतीय सेना का वह ऑपरेशन जिसमें सेना के बहादुर कमांडो उसने पीओके में घुसकर आतंकवादियों की धज्जियां उड़ा दी थी. लेकिन ने पहला मौका नहीं था जब भारतीय सेना ने किसी दूसरे देश की धरती पर ऑपरेशन चलाया हो. पहले भी कई बार भारतीय सेना विदेशों की धरती पर अपना दम दिखा चुकी है.


                              भारतीय सेना के एक ऐसे ही खतरनाक मिशन के बारे में आज आपको बताएंगे .



                                        साल था 1988 ,अब्दुल गयूम मालदीव के प्रधानमंत्री बने हुए थे. मालदीव में बहुत से लोग उनके विरोधी थे और उनका तख्तापलट करना चाहते थे. 1980 और 1983 इन 2 सालों में दो बार उन्हें सत्ता से हटाने की कोशिश की गई थी. लेकिन दोनों बार अब्दुल गयूम ने अपने विरोधियों को हरा दिया था और अपनी सत्ता बचा ली थी.


                                           लेकिन 1988 में तीसरी बार मालदीव में तख्तापलट की कोशिश हुई, और इस बार की कोशिश बहुत ही बड़े पैमाने पर की गई थी .  इसी वक्त भारतीय सेना ने मालदीव की सेना की मदद की थी.     अब्दुल गयूम के विरोधियों को को हराने में और उनकी सत्ता बचाने में .


                             

            मालदीव भारत की ही तरह अंग्रेजों के कब्जे में था,  1965 को मालदीव को आजादी मिली थी, और तभी से भारत और पाकिस्तान दोनों देश मालदीव से अच्छे रिश्ते बनाने की कोशिश कर रहे थे ,लेकिन मालदीव में ज्यादातर पापुलेशन मुस्लिम थी इसलिए मालदीव की पाकिस्तान के साथ ज्यादा करीबी रिश्ते थे बजाय भारत के.


                                           लेकिन इस ऑपरेशन के बाद मालदीव और भारत के बहुत ही मजबूत रिश्ते बन गए. जैसा कि हमने  बताया था अब्दुल गयूम 1978 में मालदीव के पंतप्रधान बने थे, और तभी से उनके विरोधियों ने सत्ता से हटाना चाहते थे. जिसकी दो बार कोशिश भी हुई थी लेकिन नाकाम रहे. लेकिन तीसरी बार जो तख्तापलट की कोशिश हुई वह काफी खतरनाक थी और इस बार इस पूरे साजिश का मास्टरमाइंड था अब्दुल्ला लतीफ.

                                         अब्दुल्ला लतीफ मालदीव का ही नागरिक था.  लेकिन वह श्रीलंका में रहकर अपना बिजनेस करता था और वह काफी अमीर भी था साथ ही साथ मालदीव के प्रधानमंत्री अब्दुल गयूम का वह कट्टर विरोधी भी था.  अब्दुल्ला लतीफ,  अब्दुल गयूमको   सत्ता से हटाकर खुद मालदीव का पंतप्रधान बनना चाहता था. लेकिन वह जानता था कि अब्दुल गयूम को सत्ता से हटाना इतना आसान नहीं है इससे पहले भी दो बार अब्दुल गए हम अपने विरोधियों को हरा चुके थे.


                                        इसलिए अब्दुल लतीफ ने श्रीलंका से ऑपरेट कर रही आतंकवादी संघटना ''पीपल्स लिबरेशन ऑर्गनाइजेशन ऑफ तमिल इलेम'' (PLOT) को अपने साजिश में शामिल कर लिया,  यह आतंकवादी संघटना पहले ''लिबरेशन ऑफ़ टाइगर ऑफ तमिल इलेम'' (LTTE) नाम की आतंकवादी संघटना का हिस्सा हुआ करती थी. लेकिन बाद में कुछ मतभेदों के कारण LTTE से PLOT अलग हो गई.



                                              बता दें कि LTTE  वही संघटना थी जो तमिलनाडु को भारत से तोड़कर एक अलग देश बनाना चाहती थी और इसी संघटना ने भारत के पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या भी की थी. अब्दुल्ला लतीफी और के PLOT बीच में यह समझौता हुआ था की अब्दुल्ला लगती हुई को मालदीव में अपना राज्य स्थापित करने में मदद करेगी और उसके बदले में अब्दुल्ला लतीफी मालदीव मैं के आतंकवादियों को पनाह देगा और उनकी पूरी मदद की जाएगी.


                                            यह वह वक्त था जब भारत में और श्रीलंका में LTTE के आतंकवादी अपनी पूरी ताकत के साथ काम कर रहे थे और तत्कालीन पंतप्रधान राजीव गांधी ने श्रीलंका में LTTE  के आतंकवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए अपनी सेना भी भेज दी थी. भारतीय सेना और   LTTE बीच लड़ाई  अपने चरम पर थी.


                                             इन्हीं परिस्थितियों के बीच 3 सितंबर 1988 को के लगभग 80 आतंकवादी सुबह सुबह मालदीव की राजधानी ''माले''  में पहुंचे. पुहुचतेही आतंकवादीयोने  सरकारी इमारतें अपने कब्जे में ले ली.  जिसमें पंतप्रधान निवास भी शामिल था.


                                           हालांकि पंतप्रधान अब्दुल गयूम उनके हाथ नहीं आए गोलीबारी शुरू होते ही उनके सुरक्षा रक्षक उन्हें सुरक्षित बाहर निकाल ले गए.  लेकिन फिर भी मालदीव के एक मंत्री और उनका परिवार आतंकवादियों के कब्जे में था. कुछ ही घंटो के अंदर आतंकवादियों का पूरे माले शहर पर कब्जा हो गया.


                                        अगर आपको ये लग राहा है कि 80 आतंकवादियोने पुरे  माले शहर पर  कैसे

कब्जा  किया तो आपको  बता दे कि माले  शहर  एक छोटेसे द्वीप पर बसा हुआ है .  जिसकी वजह से  आतंकवादीयोको  शहर पर कब्जा करणे मे आसनी हो गयी. साथ ही मालदीव कि सेना भी काफी कमजोर थी जो उन्हे रोक नही पायी.   मालदीव के पंतप्रधान अब्दुल गयूम पास ही के एक बिल्डिंग में अपनी सुरक्षा रक्षकों के साथ छुपे हुए थे. उनके विदेश सचिव ने वहीं से अलग-अलग देशों को मदद के लिए फोन लगाना शुरु किया.


                                          पाकिस्तान उनका अच्छा मित्र देश होने की वजह से सबसे पहले उन्होंने पाकिस्तान से ही मदद मांगी. लेकिन पाकिस्तान ने यह कहते हुए मना कर दिया अभी पाकिस्तान के पास उनकी मदद करने के लिए जरूरी सेना नहीं है. और साथ ही साथ मालदीव से उनके देश का अंतर काफी ज्यादा होने के कारण वह मालदीव की मदद नहीं कर पाएंगे.


                                          पाकिस्तान के ना करने के बाद मालदीव के पंतप्रधान ने श्रीलंका ब्रिटेन और अमेरिका से भी मदद मांगी. लेकिन श्रीलंका ने साफ साफ मना कर दिया और अमेरिका और ब्रिटेन ने यह कहा कि उनके देश मालदीव से काफी दूर है और जल्द से जल्द वह मालदीव में मदद नहीं भेज पाएंगे. साथ ही साथ अमेरिका ने मालदीव के पंतप्रधान से यह कहा कि वह भारत की मदद मांगी भारत उनकी मदद जरूर करेगा.


                                             आखिरकार मालदीव ने भारत फोन किया और पूरी परिस्थिति समझाते हुए भारत के पंतप्रधान से जनि राजीव गांधी से विनती की कि वे मालदीव की मदद करें.  राजीव गांधी ने तुरंत ही हामी भर दी और अगले कुछ ही घंटों में भारतीय सेना के लगभग  300 पैराट्रूपर्स   एक प्लेन में बैठ कर मालदीव की ओर रवाना हो गए और उनके पीछे जहाज से बैकअप के लिए लगभग 1600  और जवान भेजे गए.


                                          उसी दिन शाम तक भारत के पैराट्रूपर्स मालदीव पहुंच चुके थे. मालदीव के पास जब उनका प्लेन पहुंचा तब उनके सामने एक चुनौती थी कि वह प्लेन लैंड कहां कराए. क्योंकि उन्हें शक था कि शायद राजधानी का जो एयरपोर्ट था वहां पर भी आतंकवादियों का कब्जा हो. लेकिन फिर भी जोखिम उठाते हुए प्लेन उसी एयरपोर्ट पर लैंड किया गया. खुशकिस्मती से वहां पर कोई भी आतंकवादी नहीं थे उन्होंने एयरपोर्ट की तरफ ध्यान ही नहीं दिया था. सच कहा जाए तो उन्हें यह लगा ही नहीं था कि कोई इतनी जल्दी मालदीव की मदद के लिए आएगा. क्योंकि जिस सुबह उन्होंने मालदेव पर हमला किया था उसी शाम तक भारत के पैराट्रूपर्स मालदीव पहुंच चुके थे.


                                                एयरपोर्ट पर उतरते ही भारतीय पैराट्रूपर्स ने अपना काम शुरू कर दिया. और कुछ ही घंटो के अंदर अंदर उन्होंने मालदीव की राजधानी माले आतंकवादियों से मुक्त कराया. लगभग आधे आतंकवादी मारे गए और बाकी आतंकवादियों ने भारतीय सेना से खौफ खा कर सरेंडर कर दीया. खास बात यह कि इस पूरे ऑपरेशन के दौरान भारत का एक भी जवान मारा जाना तो दूर, किसी को हल्की सी खरोच तक नहीं आई.


                                                     साथ ही साथ मालदेव के पंतप्रधान और उनके सारे मंत्री सभी पूर्ण रूप से सुरक्षित है सिर्फ उनके कुछ पर्सनल बॉडीगार्ड इस पूरे मिशन में मारे गए. कार्रवाई पूरी होते ही अगले दिन भारत के बाकी जवान की मालदीव पहुंचे. और परिस्थिति अब पूरी रूप से भारतीय सेना के नियंत्रण में थी मालदीव में तख्तापलट का सबसे बड़ा प्रयास भारतीय सेना ने पूरी तरह विफल कर दिया था.


                                                    हालांकि जब भारतीय सेना का ऑपरेशन चल रहा था तब कुछ आतंकवादियों ने किनारे से एक बोट चुराए और उसमें बैठकर श्रीलंका की तरफ भागने की कोशिश करने लगे भारतीय सेना ने तुरंत जवाबी कार्रवाई करते हुए उनमें से कुछ आतंकवादियों को ढेर कर दिया. लेकिन फिर भी कुछ आतंकवादी सही सलामत भागने में कामयाब हो गए लेकिन फिर भी वह ज्यादा दूर तक नहीं जा पाए हिंद महासागर में मौजूद भारत की युद्धनौका INS गोदावरी ने इन आतंकवादियों को पकड़ लिया.


                                                       भारत द्वारा किए गए इस मिशन की पूरे विश्व में तारीफ की गई .और साथ ही साथ इस मिशन के बाद भारत और मालदीव के बीच में बहुत ही मजबूत संबंध प्रस्थापित हो गए.अगर आपके मन में यह सवाल उठ रहा हो कि भारत ने आखिर मालदीव की मदद इस ऑपरेशन में क्योंकि कि. तो उसका सीधा सा जवाब है की इस तख्तापलट की कोशिश में मास्टरमाइंड अब्दुल्ला लतीफी को PLOT आतंकवादी संघटना ने मदद की थी यह संघटना भारत विरोधी थी अगर यह तख्तापलट सफल हो जाता तो इन आतंकवादियों को हिंद महासागर के बीचो-बीच अपना एक ताकतवर देश मिल जाता जहां से यह बहुत अच्छे से ऑपरेट कर सकते थे जो भारत के लिए एक काफी खतरनाक स्थिति होती.




                                                     साथ ही साथ हिंद महासागर के क्षेत्र में अपना दबदबा कायम रखने के लिए भारत को मालदीव की मदद करना काफी जरूरी था. इस ऑपरेशन के बाद मालदीव भारत का अच्छा मित्र भी बन गया.


                                                       इस ऑपरेशन को भारतीय सेना द्वारा किए गए सबसे सफल ऑपरेशंस में से एक माना जाता है. इस ऑपरेशन के द्वारा भारतीय सेना ने यह सिद्ध कर दिया था की भारतीय सेना सिर्फ अपने जमीन पर नहीं बल्कि विदेशी धरती पर भी उतनी ही ताकतवर है.

Subscribe to Our Newsletter

  • White Facebook Icon

© 2023 by TheHours. Proudly created with Wix.com