हिंदुस्तान का सबसे शातिर चोर जो कभी पकड मे नही आया " नटवरलाल "........!!!

रोजमर्रा की जिंदगी में किसी ऐसे आदमी को जो दूसरे लोगों को बेवकूफ बनाता है उसे हम याद तो 420 कहते हैं या फिर नटवरलाल. लेकिन शायद ही कोई ये बात  जानता हो कि नटवरलाल एक असली इंसान था और वह कोई छोटा-मोटा चोर नहीं था उसके कारनामे सुनकर लोग आ चुकी दांतों तले उंगलियां दबा देते हैं.


बातों ही बातों में वह सामने वालों को ऐसे बहका देता था कि सामने वाला उस पर आंख मूंदकर भरोसा करने लगता और फिर नटवरलाल जैसा चाहे वैसा करता इसी बात का फायदा उठाकर बाद में नटवरलाल उसे लूट लेता सिर्फ भारत ही नहीं शायद पूरी दुनिया के इतिहास में नटवरलाल जैसे बहुत ही कम लोग पैदा हुए है.



                          नटवरलाल वह बंदा है जिसने 7 अजूबों में से एक ताजमहल तीन बार बेच दिया था और साथ ही साथ दो बार लाल किला और एक बार भारत का राष्ट्रपति भवन तक भी इस बंदे ने बेच दिया था. जिसे आज सब नटवरलाल के नाम से जानते हैं लेकिन उसका नाचती नाम था मिथिलेश कुमार.


                        कहा जाता है कि मिथिलेश ने वकीली की पढ़ाई की थी और उसके बाद कुछ साल उसने वकालत  की प्रेक्टिस भी  की और साथ ही साथ पटवारी की नौकरी भी  थी की लेकिन इन दोनों ही कामों में उसका मन नहीं लगता था.


                        नटवरलाल में एक हुनर था कि वह किसी की भी सिग्नेचर हूबहू कर सकता था अपनी इसी खूबी का फायदा उठाते हुए उसने अपनी जिंदगी की पहली ठगी की. अपने पड़ोसी के बैंक अकाउंट से उसके चेक पर झूठी सिग्नेचर करके ₹1000 उसने निकाल लिए यह उसकी जिंदगी की पहली चोरी की लेकिन इसके बाद वह ऐसी बहुत सी चोरियां करने वाला था.

                         





                              लेकिन बात आती है कि उसे यह नाम नटवरलाल मिला कैसे ??

                                     


कहानी कुछ यूं है कि अपने गांव में छोटी मोटी चोरियां करने के बाद जब पुलिस उसे तालाशने लगी  तब नटवरलाल कोलकाता भाग गया.  वहां उसने नकली  सरकारी ऑफिसर बन के नकली सिग्नेचर के साथ बहुत से व्यापारियों को लूटा.  लेकिन कोलकाता में जब यह बात लोगो को पता लगने लगी, तब नटवरलाल भाग कर मुंबई चला आया.


                         मुंबई में उसने नटवरलाल नाम की एक दूसरे आदमी को अपना सहायक बनाया और उसकी मदद से वो नकली सरकारी परचेसिंग ऑफिसर बन के उन व्यापारियों को लूटने लगा जिनका माल दूसरे स्टेट में फंसा हुआ होता था.  ऐसी कुछ कांड करने के बाद वह बात  पुलिस तक पहुंच गयी और पुलिस उन दोनों को ढूंढने लगी उस वक्त मिथिलेश तो पकड़ा गया लेकिन उसका साथी जिसका नाम नटवरलाल था वह भाग गया.हालांकि कुछ दिनों बाद नटवरलाल भी पुलिस की कैद से छूट गया उस किस्से के बाद उसका नाम नटवरलाल पड़ गया.


                      बाद में नटवरलाल ने मुंबई स्टॉक मार्केट में बहुत से घोटाले कीये टाटा बिरला अंबानी जैसी बड़ी बड़ी कंपनियों को उसने नहीं छोड़ा और अब यह सब चीजें कम पड़ गई थी इसलिए उसने कुछ सालों बाद दुनिया का सातवां सबसे बड़ा अजूबा ताजमहल उसे विदेशी नागरिकों को  बेच दिया सरकारी अफसर बनकर और वह भी एक बार नहीं तीन बार.




                     यह उसका इकलौता कारनामा नहीं है नटवरलाल ने दिल्ली का लाल किला और राष्ट्रपति भवन भी विदेशी नागरिकों को बेच दिया था. लेकिन उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा कारनामा था पार्लिमेंट हाउस बेच देना भारत का संसद भवन जिसमें पूरे देश की किस्मत तय होती है वह भी उसने बेच दिया नकली सरकारी अफसर बनकर.

                     

नटवरलाल को पुलिस ने कई बार पर धर दबोचा लेकिन वह कभी भी ज्यादा दिनों तक पुलिस कस्टडी में नहीं रहा पकड़ने के कुछ दिनों बाद ही वह कुछ ना कुछ जुगाड़ लगाकर भाग जाता. नटवरलाल को आखिरी बार पुलिस ने पकड़ा था जब वह 75 साल का था लेकिन वह  वहां से भी भाग गया.


                 उसके गांव के लोग उसे अच्छा इंसान मानते थे क्योंकि वह अमीरों से लूटा हुआ पैसा गांव के गरीब लोगों में बांट दिया करता था उस ने जिंदगी में जितनी भी चोरियां की उसमें से एक का भी उसे कभी पछतावा नहीं हुआ क्योंकि इस उसके हिसाब से वह जो भी कर रहा था वह सब सही था.


                                 तो ऐसे यह थी कहानी भारत के सबसे बड़े कॉन मैन की.


नटवरलाल की मृत्यु कब हुई इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है कुछ लोग मानते हैं कि वह 2009 में मरा कुछ मानते हैं कि 2004 में और नटवरलाल के रिश्तेदार कहते हैं कि वह 1996 मैं ही मर गया था.

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