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भारत माता के महान क्रांतिकारी उधमसिंग कि कहानी.


  जलियांनवाला बाग़ हत्याकांड भारत के इतिहास का वो काला पन्ना जिसकी याद भर से हर भारतीय दुख और ग़ुस्से से भर जाता है.


13 अप्रैल 1919 बैसाखी का पवित्र दिन , पंजाब के अमृतसर शहर में  जलियांनवाला बाग़ के चारो ओर से दीवारों से घिरे हुए प्रांगण में लगभग 20,000   निहत्थे भारतीय नागरिक बैसाखी का उत्सव मनाने के लिए जमा हुए थे. तभी जनरल डायर जो कि  अमृतसर के सैन्य अधिकारी थे,  जलियांनवाला बाग़ में जाने आने का इकलौता रास्ता बंद कर दिया और अपनी सेना को वहाँ जमा हुए लोगों पर गोलियां चलाने का आदेश दिया. आधिकारिक आकड़ो के मुताबिक 1500 लोग उस नरसंहार में मारे गए. हालांकि ये आंकड़ा इस से कई ज्यादा था.

                          उस दिन  जलियांनवाला बाग़ में एक 20 साल का नौजवान भी मौजूद था , गोलीबारी से जैसे तैसे वो अपनी जान बचा पाया था. लेकिन उस अमानवीय नरसंहार ने उसके मन मे प्रतिशोध की ज्वाला भड़का दी थी. उसकी जीवन का अब एकही मकसद बचा था ,  जलियांनवाला बाग़ हत्याकांड का बदला लेना.


उस युवक का नाम था सरदार उधम सींग.



उधम सिंग 26 दिसंबर  1899 को पटियाला में पैदा हुए थे. 7 साल की उम्र में उनके माता पिता गुजर गए , और  18 साल की उम्र में बड़े भाई की मौत हो गयी. उधम सिंग का दुनिया मे कोई नहीं   था , वो बिलकुल अकेले थे. और अपनों को खोने का दर्द अच्छी तरह से जानते थे. इसीलिए 13 अप्रैल के उस काले दिन जब उन्होंने  जलियांनवाला बाग़ में खून की नदियां बहती दिखी छोटे बच्चो और बूढे लोगो को गोलियों से छलनी होते देखा, निहत्ये लोगों को अपनी आखो के सामने मरते देखा तब उनके अंदर  क्रोध की ज्वाला भड़क उठी. उन्होंने उस हत्याकांड का बदला लेने की कसम खाई.


वो क्रांतिकारी गुटो में शामिल हो गए. कुछ सालों बाद वो अमरीका चले गए और गदर पार्टी नामके क्रांतिकारी संगठन में शामिल हो गए, गदर पार्टी में कुछ साल काम करने के बाद , 1927 में उन्हें उनके कुछ साथियों के साथ अमेरिका से भारत बंदूके ले जाने का काम दिया गया. लेकिन उनको पकड़ लिया गया और उनको पाच साल की सजा भी हो गयी.




     इसी दौरान दुर्भाग्यवश जनरल डायर की भी इसी दौरान मौत हो गयी. उनके जेल से छूटने के बाद भी पुलिस उनपर नजर रखे हुई थी.इसलिये उनको कुछ दिनो तक शांत बैठना पड़ा.

लेकिन वो ज्यादा दिनों तक शान्त नहीं बैठ पाए. 1930 वो भारत छोड़ लंदन चले गए. 1940 तक वो लंदन में ही रहे , इंतजार करते हुए, सही मौके का. 1940 को उन्हें ये मौक़ा मिला.


दीन था 13 मार्च 1940, लंदन के caxton hall में, मायकल ओ डायर का जाहिर सभा में संबोधन था. मायकल ओ डायर हत्याकांड के वक्त उस प्रान्त के गवर्नर थे. जनरल डायर के वो वरिष्ठ थे और हत्याकांड के उनके कृत्य पर जनरल डायर को समर्थन भी दे चुके थे , उस हत्याकांड के बाद जनरल डायर को सजा देने के बजाय उन्होंने जनरल डायर को सन्मानित किया था. जलियांवाला बाग के हत्याकांड के लिये मायकल ओ डायर भी उतनेही जिम्मेदार थे.


उधम सिंग ने उसे मारने का फैसला किया.




  13 मार्च की शाम मायकल डायर सभा को संबोधित करने उठा, और उसने अपना संबोधन सुरु ही किया था कि सामने बैठे उधम सिंग ने बन्दूक निकालकर सारी गोलियां डायर के सीने में दाग दी. पूरे हॉल में अफरा तफरी मच गई. लेकिन वहां से भागने की बजाय उधम सिंग वही खड़े रहकर भारत माता की जय के नारे देने लगे. निष्पाप भारतीयों के हत्याकांड का बदला उन्होंने ले लिया था. वो खुद पुलिस के हवाले हो गए. 30 जुलाई 1940 को उन्हें फांसी दे दी गईं.


ये बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण बात है कि आज बहुत से भारतीय इस महान क्रांतिकारी के बारे में नही जानते.